पिछले कुछ महीनों में, भारतीय शेयर बाज़ार में ऐसी अस्थिरता देखी जा रही है, जैसी हमने 2020 के COVID क्रैश के बाद से नहीं देखी थी।
सेंसेक्स और Nifty Fifty, जिन्हें हमेशा इन्वेस्टर के भरोसे का प्रतीक माना जाता था, अब लगातार उतार-चढ़ाव का सामना कर रहे हैं।
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बहुत से लोग पूछ रहे हैं, “क्या 2026 में एक बड़ी मंदी आने वाली है?”
आइए इस गिरावट के पीछे के असली कारणों, मार्केट ट्रेंड्स और आने वाले साल के लिए संभावनाओं के बारे में जानें।

2026 में सेंसेक्स और निफ्टी की मौजूदा स्थिति
दिसंबर 2026 तक, सेंसेक्स करीब 620 अंक गिर गया था, जबकि निफ्टी 50 25,800 से नीचे फिसल गया था।
इस गिरावट से निवेशकों को मार्केट कैपिटलाइज़ेशन में ₹7 लाख करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हुआ है।
लेकिन यह सिर्फ़ “एक दिन की गिरावट” नहीं है—
पिछले तीन महीनों से बाज़ार लगातार दबाव में है।
मिड-कैप और स्मॉल-कैप शेयरों में तेज़ गिरावट ने छोटे निवेशकों को भी सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है।
Global Factors Behind the Crash (क्रैश के पीछे वैश्विक कारक)
भारत का शेयर बाज़ार अब दुनिया से जुड़ा हुआ है।
इसलिए, जब अमेरिकी या यूरोपीय अर्थव्यवस्था में बदलाव होते हैं, तो उनका सीधा असर हमारे बाज़ार पर भी पड़ता है।
(A) अमेरिकी फेडरल रिज़र्व पॉलिसी
अमेरिका में ब्याज दरें फिर से बढ़ने की उम्मीद है।
जब ऐसा होता है, तो विदेशी निवेशक (FIIs) भारत जैसे उभरते बाज़ारों से पैसा निकालना शुरू कर देते हैं और अमेरिका में निवेश करते हैं।
इससे भारतीय बाज़ार में बिकवाली बढ़ जाती है।
(B) डॉलर की मज़बूती और रुपये की कमज़ोरी
2025 में, रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर 85.3 पर गिर गया।
इसका सीधा असर आयात करने वाली कंपनियों के मुनाफ़े पर पड़ा, और निवेशकों ने सावधानी बरतना शुरू कर दिया।
(C) ग्लोबल ट्रेड वॉर और अनिश्चितता
अमेरिका और चीन के बीच नए सिरे से व्यापार तनाव की खबरों से एशियाई बाज़ारों में डर फैल गया।
इसका असर भारत समेत सभी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा।
Domestic Reasons for the Fall (पतन के घरेलू कारण)
(A) विदेशी निवेशकों का बिकवाली का दबाव
पिछले तीन महीनों में FIIs ने भारतीय बाज़ार से लगभग ₹30,000 करोड़ निकाले हैं।
जब बड़े विदेशी फंड बेचते हैं, तो रिटेल निवेशक भी घबरा जाते हैं, जिससे पैनिक सेलिंग होती है।
(B) कॉर्पोरेट नतीजों में निराशा
IT, ऑटो और FMCG जैसे कई बड़े सेक्टर्स ने 2025 की दूसरी और तीसरी तिमाही में उम्मीद से कम नतीजे दिए।
इससे निवेशकों का भरोसा कम हुआ।
(c) मिडकैप-स्मॉलकैप का ओवरवैल्यूएशन
इन सेक्टर्स में 2024-25 में काफी ग्रोथ देखी गई थी।
अब जब प्रॉफिट बुकिंग शुरू हो गई है, तो बड़ी गिरावट तय है।
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Which Sectors Were Most Affected? (कौन से सेक्टर सबसे ज़्यादा प्रभावित हुए?)
| Sector | Decline (%) | Main Reasons |
|---|---|---|
| IT | 6–8% | Declining demand from global clients |
| Auto | 5% | Declining export demand, higher input costs |
| FMCG | 4% | Weak rural demand |
| Banking | 7% | FII selling and NPA concerns |
| Midcap/Smallcap | 10–15% | Profit booking and high valuations |
“Crash” or Just a “Correction”? (क्या यह सच में “क्रैश” है या सिर्फ “करेक्शन”?)
कई एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह कोई क्रैश नहीं, बल्कि एक करेक्शन है।
2024 में मार्केट ने रिकॉर्ड ऊंचाई हासिल की—
सेंसेक्स 78,000 पर पहुंचा, और निफ्टी 50 ने 26,500 का आंकड़ा पार किया।
इतनी तेज़ रैली के बाद, अगर मार्केट 10-12% गिरता है,
तो यह एक नैचुरल ब्रेक या सांस लेने की जगह है,
ताकि मार्केट खुद को फिर से बैलेंस कर सके।
What Should investors do? (निवेशकों को क्या करना चाहिए?)
- घबराएं नहीं—धैर्य रखें।
- इतिहास बताता है कि हर बड़ी गिरावट के बाद सेंसेक्स नई ऊंचाइयों पर पहुंचता है।
- लार्ज-कैप कंपनियों में SIPs जारी रखें।
- HDFC बैंक, TCS और रिलायंस जैसी कंपनियों के फंडामेंटल्स मज़बूत हैं।
- मिडकैप/स्मॉलकैप मार्केट में सोच-समझकर चुनें।
- सिर्फ़ उन्हीं स्टॉक्स को खरीदें जिनका P/E रेश्यो सही हो और कंपनी पर कर्ज़ कम हो।
- डिविडेंड देने वाले स्टॉक्स पर ध्यान दें।
- ऐसे स्टॉक्स मार्केट में गिरावट के बावजूद स्थिर रिटर्न देते हैं।
- लंबे समय का विज़न रखें (3-5 साल)।
- 2026 के बाद भी भारत की ग्रोथ स्टोरी मज़बूत दिख रही है—
- जनसंख्या, उत्पादन और डिजिटल इकॉनमी सभी तेज़ी से बढ़ रहे हैं।
मार्केट प्रेडिक्शन 2026 – आगे क्या होगा?
कई एनालिस्ट 2026 के लिए सावधानी से आशावादी हैं।
सकारात्मक संकेत:
भारत की GDP ग्रोथ का अनुमान 6.8% से ऊपर बना हुआ है।
सरकार का इंफ्रास्ट्रक्चर और मैन्युफैक्चरिंग पर फोकस बढ़ रहा है।
ग्रामीण इलाकों में डिमांड धीरे-धीरे बेहतर हो रही है।
अगर फेड दरें स्थिर रहती हैं, तो FIIs के लौटने की संभावना बढ़ेगी।
जोखिम कारक:
अगर कच्चे तेल की कीमतें $90 से ऊपर जाती हैं, तो महंगाई बढ़ेगी।
वैश्विक मंदी या अमेरिकी चुनावों में अस्थिरता का असर हो सकता है।
IPO और सट्टेबाजी वाली ट्रेडिंग से और ज़्यादा ओवरवैल्यूएशन हो सकता है।
अनुमान:
अगर सब कुछ सामान्य रहता है,
तो 2026 के मध्य तक सेंसेक्स 82,000–85,000 और निफ्टी 50 लगभग 27,500 तक पहुँच सकता है।
लेकिन शॉर्ट-टर्म में उतार-चढ़ाव बना रहेगा।
Conclusion (निष्कर्ष)
2025 के क्रैश ने एक बार फिर हमें याद दिलाया है कि
शेयर बाज़ार शॉर्टकट का खेल नहीं है, बल्कि सब्र और समझदारी का खेल है।
अभी सेंसेक्स और निफ्टी में जो करेक्शन दिख रहा है,
वह एक लंबे बुल रन की “तैयारी” भी हो सकती है।
अगर आप एक स्मार्ट इन्वेस्टर हैं—
तो यह डरने का समय नहीं है, बल्कि “सही कंपनियों को चुनने” का समय है।